बुधवार, 2 नवंबर 2011

भोर



कालरात्रि का संहार कर हुयी है, नयी भोर,
पक्षियों के कलरव का होने लगा मधुर शोर,
तान से तान मिलकर गाने लगे कोयल और मोर,
हर नयी तान में लगा के पहले से ज्यादा जोर |

अभी भी दिखती सुदूर नभ में है, चन्द्र-कोर,
उभरी आकृति क्षितिज पर जिसका ना है कोई छोर,
हर क्षण लगे मानो ऐसे, खींचे उसे कोई बिना डोर,
चढ़ती जाये वो आसमान में लगाये बिना कोई जोर |

स्वर्णिम उस आकृति से फैला उजाला चहुँ ओर,
दे रही भोर सन्देश मानो, शुरू हुआ एक नया दौर,
और कर रही है समाप्त अब ये सबकी निद्रा घोर,
शुरू हुयी सबकी दिनचर्या कर घड़ी के काँटों पर गौर |

निकले हैं चरवाहे के साथ चरने सभी ढोर,
और बछड़े रंभाते है लगा के अपना पूरा जोर,
स्त्रियाँ चलीं, ले गगरी, पनघट और कुएं की ओर,
बैठे है ताक लगा के वहां सब बेकाम चितचोर |

प्रकाश की उष्णता हो रही है हर क्षण तीव्र और, 
मंद-ठंडी समीर भी अब पड़ रही है कमजोर, 
खुले में विचरण करना अब हो रहा है कठोर,
बैठे वृक्षों की छाँव में पशु अपने शरीरों को बटोर |

हुयी अब समाप्त ये स्फूर्तिदायक भोर,
हो रहा हर्षित अब प्रतीक्षा में बैठा चकोर,
भोरांत से हुए हैं चिंतामुक्त, तारे और चन्द्र-कोर,
दिशा-पूर्व भी सोच रही, 'कब होगी अगली नयी भोर?' |

रविवार, 16 अक्टूबर 2011

द्वय - आँखें

दुःख में नीर बहाती आँखें,
सुख में भी भर आती आँखें |
प्रियजनों को देख हर्षाती आँखें,
अनचाहों को देख रक्तित हो जाती आँखें |


                                                    स्वप्नों से बहराई आँखे,
                                                    चिंता में गहराई आँखे |
                                                    प्रतीक्षा में पथराई आँखें,
                                                    अश्रुओं से तर आई आँखें |

जग का दर्शन कराती आँखें,
सबका सच बताती आँखें |
रंगों की पहचान कराती आँखें,
अवरोधों से बचाती आँखें |

                                                    मुख की शोभा बढ़ाती आँखें,
                                                    लहरों से लहराती आँखें |
                                                    लज्जा से झुक जाती आँखे,
                                                    संकेतों में संदेशे बताती आँखें |


चुप रह कर भी बहुत कुछ कह जाती ये आँखे,
और बहुत कुछ कहकर भी कुछ न कह पाती ये आँखें |
अभिनय और नृत्य का विशेष अंग हैं ये आँखें,
कोई भी भाव अधूरा है, जब तक प्राण न भरें उसमें ये आँखें |


                                                    बड़ी अनमोल हैं द्वय ये आँखें,
                                                    न करे व्यर्थ, करें दान ये अतुल्य आँखें |
                                                    कर दें दीप्त और भी जीवन देकर ये आँखें,
                                                    और कर दें अमर अपनी ये अद्भुत द्वय आँखें |


शनिवार, 8 अक्टूबर 2011

सैर और संवाद



चलो छोटू आज तुम्हें सैर करा कर लाता हूँ,
पुस्तकों के अम्बार से तुम्हें अल्पविराम दिलाता हूँ |

पुस्तकों में वर्णित प्रकृति को प्रत्यक्ष ही दिखलाता हूँ,
जितनी जानकारी है मुझे, उसे तुम्हें बतलाता हूँ |

भैया कितनी शांति है यहाँ, और चल रही है मंद पवन,
शायद इसलिए ऐसी जगहों पर आकर भूल जाते हैं लोग उलझन |

हाँ सही कहते हो तुम छोटू, हो जाता है प्रसन्न मन,
और भर जाता है, एक नयी स्फूर्ति से ये तन |

भैया वो कौन सा वृक्ष है?
लगता है जैसे खड़ा कोई दरबान दक्ष है |

छोटू बरगद का विराट वृक्ष तुम्हारे समक्ष है,
पुराणों के अनुसार जो देवों के समकक्ष है |

भैया वो देखो इसकी शाखाओं से जो निकली लताएं,
लगता है जैसे कोई साधू खड़ा है खोले अपनी जटायें |

वो देखो भैया वो कितना सुन्दर पहाड़ है,
उसमें कौन सा वो लम्बा सा झाड है ?

ये झाड नहीं, 'फल लागे अति दूर' वाला पेड़-ए-ताड़ है,
और इसकी न छाया है न छुपाने की लिए आड़ है |

भैया वो देखो वृक्ष आम के,
क्यूँ न खाएं हम कुछ आम बिना दाम के?

देख के बड़े आम मुझे भी भूख लग आयी है,
ज़रा उन नयी-चमकती पत्तियों को देखो, जैसे अभी-2 ही वो नहाई हैं |

देखो भैया ये नीम का पेड़ कड़ी जिसकी छाल है,
करता है मानव शरीर की रक्षा बनके ढाल है |

अरे वाह छोटू तुम तो काफी जानकार हो,
तुम उस बड़े वाले आम के हकदार हो |

बहुत आम हैं खा लिए, भर गय पेट, अब आगे चलते हैं,
चार आम रख लो थैले में, साल में ये आम एक ही बार क्यूँ फलते हैं !

वो देखो है पीपल का पावन पेड़ वो, जिसमें होता श्रीहरि का वास है,
प्राणवायु बहुतायत में निर्मित ये करता, जिससे चलती प्राणियों की श्वास है |

अरे भैया वो कौन सी है चिरैया ?
छोटू वो है, अब बिरले ही दिखने वाली गौरैया |

छोटू देखो वो खेतों को बाँटती मेढ़ है,
और उस पर लगे, दवा में लगने वाले, नीलगिरी के लम्बे पेड़ हैं |

और वो देखो दूर उस झुरमुट में लगे हैं बाँस,
हैं तो ये बहूपयोगी, पर लगती है बड़ी बुरी इसकी फाँस |

देखो ये है पेड़, दवाइयों में प्रयुक्त होने वाले बबूल हैं,
जरा बचके हाथ लगाना इसकी टहनियों में बहुत सारे शूल हैं |

और ये देखो ये पौधा है पथरचटा ,
ये जिस पत्थर पर उगे वो निश्चित ही फटा |

भैया वो देखो जामुन का पेड़, अब थोड़े जामुन भी हम खाते हैं,
छोटू अभी तुम कुछ ना पाओगे चूँकि ये बरसात के बाद ही पक पाते हैं |

ये भी शरीर के लिए बहुत लाभकारी है,
दूर रखता ये मदुमेह जैसे बीमारी है |

छोटू शाम है हो चली अब चलते हैं घर,
सही समय ना घर पहुंचें तो माँ चिंता से जायेगी डर |



मंगलवार, 2 अगस्त 2011

** वड़ा - पाव **

कहाँ गयी पेड़ों की वो छाँव हैं ?
अब तो बस चित्रों में रह गए, वो सुंदर गाँव हैं,
चारों ओर बस कौओं की काँव-काँव है |

कहाँ गया प्रेम का वो भाव है ?
आज अपनों के लिए ही समय का अभाव है !
ह्रदय पर लगते कई नित-नये घाव हैं |

फँसे भ्रष्टाचार की दलदल में सबके पाँव हैं,
जीवन का ही लगा आज दाँव है...
मनुष्य को फिर भी देखो कितना ताव है !

भंवर में फँसी ये मन की नाव है,
खाने में न रह गया चाव है,
रह गया खाने को बस वड़ा-पाव है... !!


शनिवार, 25 जून 2011

वर्षा - आगमन


कितने काले मेघ हैं छाये, लेकर घनघोर वर्षा हैं आये,
ढेर सारा हर्ष और किसी-किसी के लिए वेदना भी लाये |

                  करें निवेदन इनसे आयें, तप्त इस धरती की तृष्णा पूर्ण बुझा के ही जाएँ,
                  पर बरसे बस उतना ही, जितना इस धरा में समा पाए|  
     
सूरज और मेघों की आँख-मिचौली गयी, अंततः थम,
धरती आज हुयी है, बड़े दिनों बाद नम|
                
                   शुरू हो गयी है, बरखा की जोरों की झड़ी,
                   गुम हो गयी इस झड़ी में, वो धूप कड़ी|

बच्चे तो आज सड़क पर ही हैं नहाते,
'और जोर से बरसो' बस यही पुरजोर हैं चिल्लाते |

                   बड़े तो किसी टपरे के नीचे चाय-पकौड़े हैं उड़ाते,
                   युगल भीगते हुए ही, भुट्टे का लुत्फ़ हैं उठाते |

तो वृद्धजन बरामदे से ही दृश्य हैं निहारते,
राहगीर घने पेड़ों के नीचे अपना सिर हैं छुपाते |

                  कौंधती ये बिजली कर देती है, सभी के रोंगटे खड़े,
                  गर्जना की ध्वनि से विचलित होते हैं सभी, बच्चे-बूढ़े और या हों बड़े|

चहुँ ओर जल-धारायें हैं दिखती,
ठंडी समीर तन-मन को ताज़ा है कर देती |

                    वर्षा का वेग कुछ कम हुआ सा है जान पड़ता,
                    परन्तु बरखा रानी का मन तो और बरसने का है लगता |

मेघ अब भी रिमझिम-रिमझिम हैं बरसते,
पाठशाला के कमरों के छत तो अब भी रह-रह कर हैं टपकते |

                     मेंढक ऊँची कूद की प्रोतियोगिता हैं करते ,
                     और मयूर नृत्य-स्पर्धा करते से हैं लगते|

पक्षियों के ये कलरव कर्णप्रिय हैं लगते,
चहुँ ओर नव-निराले संगीत सुनने को वर्षाकाल में है मिलते|

                       वर्षा-वेग कम होते ही जनजीवन सामान्य है हो चला,
                       हर राहगीर फिर अपनी मंजिल की ओर बढ़ चला |

वर्षा को आज है विराम,
मानो मेघराज कर रहे हैं आज विश्राम|

                        बादलों की चादर से निकले सूर्य नारायण, हुयी इनकी निद्रा है भंग,
                        फिर भी झिलमिला दी इन्होने धरती, मिल के बूंदों के संग |

नव-जीवन के अंकुर धरती से हैं फूटे,
दिखते है सभी दिशाओं में नये फूल-पत्ते और बूटे|

                          आशा है वर्षा का ये आगमन, आ-गमन न हो जाए,
                          इस बार ये वर्षा केवल हर्ष ही हर्ष और नगण्य वेदना देके जाएँ|




शनिवार, 7 मई 2011

एक बचपन ऐसा भी !!


न दशा है, न दिशा है, यही इनकी व्यथा है,
भीख मांगना ही जैसे इनकी प्रथा है |

                     कब तक चलेगी यही गाथा,
                     देखकर इन्हें भर जाता है, लकीरों से ये माथा |

न है कोई करने को इनकी रक्षा,
इन्हीं के माता-पिता ने इन्हें नहीं बक्शा |

                    न मिली है, इन्हें कोई शिक्षा,
                    बस पैसे कमाने के लिए मांग रहे हैं, जबरन ये भिक्षा |

चेहरों पर इनके दिखती है, एक आशा,
अपशब्द और गलियाँ हैं, इनकी भाषा |

                   न जाने ये ख़ुशी की परिभाषा,
                   पर बेचकर खिलौने-गुब्बारे करते पूरी दूसरों की अभिलाषा |

ढेरों जूते हैं, पास में पर चमकाने को.
देखों तो नहीं है, एक जोड़ी भी नाजुक-कोमल पैर बचाने को |

                   नाम अगर हो भी तो इनका नाम पुकारने वाला कोई मुख नहीं ,
                   दुःख ही दुःख हैं, इनके लिए रत्ती भर का सुख नहीं |

भाग्य के नाम पर मिलती है दुत्कार,
खाने के नाम पर फिका हुआ खाना और लोगों की फटकार |

                  नहीं हैं ढंग के कपडे ढकने को तन,
                  नए कपड़ों के स्थान पर करते हैं, उतरन से ही संतुष्ट मन |

धूप में लू के थपेड़ो को हैं ये सहते,
न जाने बरसात के दिनों में कैसे हैं ये रहते ! 

                 ठण्ड में ठिठुरने के अलावा कोई चारा नहीं,
                 इनसे ज्यादा कोई बेचारा नहीं |

घर के नाम पर बस है, "तीन गुणा तीन" का साया,
इसी में इनका पूरा परिवार नींद में समाया |

                 साथी हैं इनके जुआं और सट्टा,
                 देश के भविष्य को लग रहा है बट्टा |

Chocolates इन्हें भी भाती हैं,
मिठाई देख के इनकी भी जीभ ललचाती है |

                 बचपन तो इनका धरती पर आते ही जैसे खो गया,
                 स्नेह के अकाल में इनका बचपन पूरा गुजर गया |

सरकारें आती हैं, जाती हैं,
इनके लिए योजनायें बनाती ही रह जाती हैं |

                 सरकारों से उम्मीदें रखना है बेमानी,
                 बदलाव के लिए जरुरी है, जागृति फैलानी |

इनको भी बचपन जीने दो,
और भविष्य के सपने सीने दो |

                 मन में इनके भी लेती हैं, इच्छाएं आकार,
                 इनको भी करने दो सपने साकार |


               









बुधवार, 23 फ़रवरी 2011

क्यूँ ???

                                                

क्यूँ आज पैसा कमाने की दौड़ में खुशियों की परिभाषा ही बदल गयी,
आँखों की निश्चलता इस  चका-चौंध में जैसे कहीं गुम ही गयी?

क्यूँ आज सहनशीलता मानो मरुस्थल में मरूद्यान सी हो चली,
अराजकता ही मानव की जीवन संगिनी है हो चली?

क्यूँ आज सामंजस्य, समझौता, सर्व-सम्मति जैसे शब्द मानव को नव-निराले लगते हैं,
और नव-निरंतर निर्मित अपशब्द ही निज और प्यारे से लगते हैं?

क्यूँ कभी दैदीप्यमान रहे प्रेम, स्नेह आज मलिन से लगते हैं,
स्वार्थ और वासना ही मानव के शिरोधार्य रहते हैं?

क्यूँ आज सहयोग और सहकार्य तो जैसे किसी धूमिल स्मृति से लगते हैं,
प्रतिस्पर्धा के नाम पर मानव के मन में बस इर्ष्या और द्वेष ही बसते हैं?

क्यूँ आज मानव हो रहा है दंभी और स्वार्थी,
मानवता की तो जैसे मानव के ही हाथों उठती है अर्थी?

क्यूँ आज रिश्ते-नाते पीठ पर लादे हुए बोझ के समान लगते हैं,
अतिथि तो अब घर के बजट को नगवारे ही लगते हैं?

क्यूँ आज रोशनी है पर दिवाली नहीं,
लगता है मानव को प्रकृति माँ प्यारी नहीं?

क्यूँ विकासांध मानव को नहीं है किसी के जीवन का कुछ  मूल्य,
तो इसमे अचम्भा ही क्या है, जो कर रहा है नष्ट धरा की सम्पदा अमूल्य?

फिर भी मन में एक आस है,
जल्द ही बुझेगी मानव की ये प्यास है.

हे इश्वर मानव के मस्तिष्क को झकझोर दे,
मानव के इस अवचेतन मन में सुप्त सदगुणों  को एक नया जीवन दे!

मानव न कर इस सृष्टि को नष्ट तू,
कम से कम अब तो हो जा संतुष्ट तू!

हे मानव तू जागृत क्यूँ नहीं होता,
आखिर क्यूँ नहीं ये जीवन अपना सार्थक कर देता?