कहाँ गयी पेड़ों की वो छाँव हैं ?
अब तो बस चित्रों में रह गए, वो सुंदर गाँव हैं,
चारों ओर बस कौओं की काँव-काँव है |
कहाँ गया प्रेम का वो भाव है ?
आज अपनों के लिए ही समय का अभाव है !
ह्रदय पर लगते कई नित-नये घाव हैं |
फँसे भ्रष्टाचार की दलदल में सबके पाँव हैं,
जीवन का ही लगा आज दाँव है...
मनुष्य को फिर भी देखो कितना ताव है !
भंवर में फँसी ये मन की नाव है,
खाने में न रह गया चाव है,
रह गया खाने को बस वड़ा-पाव है... !!