रविवार, 16 अक्टूबर 2011

द्वय - आँखें

दुःख में नीर बहाती आँखें,
सुख में भी भर आती आँखें |
प्रियजनों को देख हर्षाती आँखें,
अनचाहों को देख रक्तित हो जाती आँखें |


                                                    स्वप्नों से बहराई आँखे,
                                                    चिंता में गहराई आँखे |
                                                    प्रतीक्षा में पथराई आँखें,
                                                    अश्रुओं से तर आई आँखें |

जग का दर्शन कराती आँखें,
सबका सच बताती आँखें |
रंगों की पहचान कराती आँखें,
अवरोधों से बचाती आँखें |

                                                    मुख की शोभा बढ़ाती आँखें,
                                                    लहरों से लहराती आँखें |
                                                    लज्जा से झुक जाती आँखे,
                                                    संकेतों में संदेशे बताती आँखें |


चुप रह कर भी बहुत कुछ कह जाती ये आँखे,
और बहुत कुछ कहकर भी कुछ न कह पाती ये आँखें |
अभिनय और नृत्य का विशेष अंग हैं ये आँखें,
कोई भी भाव अधूरा है, जब तक प्राण न भरें उसमें ये आँखें |


                                                    बड़ी अनमोल हैं द्वय ये आँखें,
                                                    न करे व्यर्थ, करें दान ये अतुल्य आँखें |
                                                    कर दें दीप्त और भी जीवन देकर ये आँखें,
                                                    और कर दें अमर अपनी ये अद्भुत द्वय आँखें |


शनिवार, 8 अक्टूबर 2011

सैर और संवाद



चलो छोटू आज तुम्हें सैर करा कर लाता हूँ,
पुस्तकों के अम्बार से तुम्हें अल्पविराम दिलाता हूँ |

पुस्तकों में वर्णित प्रकृति को प्रत्यक्ष ही दिखलाता हूँ,
जितनी जानकारी है मुझे, उसे तुम्हें बतलाता हूँ |

भैया कितनी शांति है यहाँ, और चल रही है मंद पवन,
शायद इसलिए ऐसी जगहों पर आकर भूल जाते हैं लोग उलझन |

हाँ सही कहते हो तुम छोटू, हो जाता है प्रसन्न मन,
और भर जाता है, एक नयी स्फूर्ति से ये तन |

भैया वो कौन सा वृक्ष है?
लगता है जैसे खड़ा कोई दरबान दक्ष है |

छोटू बरगद का विराट वृक्ष तुम्हारे समक्ष है,
पुराणों के अनुसार जो देवों के समकक्ष है |

भैया वो देखो इसकी शाखाओं से जो निकली लताएं,
लगता है जैसे कोई साधू खड़ा है खोले अपनी जटायें |

वो देखो भैया वो कितना सुन्दर पहाड़ है,
उसमें कौन सा वो लम्बा सा झाड है ?

ये झाड नहीं, 'फल लागे अति दूर' वाला पेड़-ए-ताड़ है,
और इसकी न छाया है न छुपाने की लिए आड़ है |

भैया वो देखो वृक्ष आम के,
क्यूँ न खाएं हम कुछ आम बिना दाम के?

देख के बड़े आम मुझे भी भूख लग आयी है,
ज़रा उन नयी-चमकती पत्तियों को देखो, जैसे अभी-2 ही वो नहाई हैं |

देखो भैया ये नीम का पेड़ कड़ी जिसकी छाल है,
करता है मानव शरीर की रक्षा बनके ढाल है |

अरे वाह छोटू तुम तो काफी जानकार हो,
तुम उस बड़े वाले आम के हकदार हो |

बहुत आम हैं खा लिए, भर गय पेट, अब आगे चलते हैं,
चार आम रख लो थैले में, साल में ये आम एक ही बार क्यूँ फलते हैं !

वो देखो है पीपल का पावन पेड़ वो, जिसमें होता श्रीहरि का वास है,
प्राणवायु बहुतायत में निर्मित ये करता, जिससे चलती प्राणियों की श्वास है |

अरे भैया वो कौन सी है चिरैया ?
छोटू वो है, अब बिरले ही दिखने वाली गौरैया |

छोटू देखो वो खेतों को बाँटती मेढ़ है,
और उस पर लगे, दवा में लगने वाले, नीलगिरी के लम्बे पेड़ हैं |

और वो देखो दूर उस झुरमुट में लगे हैं बाँस,
हैं तो ये बहूपयोगी, पर लगती है बड़ी बुरी इसकी फाँस |

देखो ये है पेड़, दवाइयों में प्रयुक्त होने वाले बबूल हैं,
जरा बचके हाथ लगाना इसकी टहनियों में बहुत सारे शूल हैं |

और ये देखो ये पौधा है पथरचटा ,
ये जिस पत्थर पर उगे वो निश्चित ही फटा |

भैया वो देखो जामुन का पेड़, अब थोड़े जामुन भी हम खाते हैं,
छोटू अभी तुम कुछ ना पाओगे चूँकि ये बरसात के बाद ही पक पाते हैं |

ये भी शरीर के लिए बहुत लाभकारी है,
दूर रखता ये मदुमेह जैसे बीमारी है |

छोटू शाम है हो चली अब चलते हैं घर,
सही समय ना घर पहुंचें तो माँ चिंता से जायेगी डर |