शनिवार, 7 मई 2011

एक बचपन ऐसा भी !!


न दशा है, न दिशा है, यही इनकी व्यथा है,
भीख मांगना ही जैसे इनकी प्रथा है |

                     कब तक चलेगी यही गाथा,
                     देखकर इन्हें भर जाता है, लकीरों से ये माथा |

न है कोई करने को इनकी रक्षा,
इन्हीं के माता-पिता ने इन्हें नहीं बक्शा |

                    न मिली है, इन्हें कोई शिक्षा,
                    बस पैसे कमाने के लिए मांग रहे हैं, जबरन ये भिक्षा |

चेहरों पर इनके दिखती है, एक आशा,
अपशब्द और गलियाँ हैं, इनकी भाषा |

                   न जाने ये ख़ुशी की परिभाषा,
                   पर बेचकर खिलौने-गुब्बारे करते पूरी दूसरों की अभिलाषा |

ढेरों जूते हैं, पास में पर चमकाने को.
देखों तो नहीं है, एक जोड़ी भी नाजुक-कोमल पैर बचाने को |

                   नाम अगर हो भी तो इनका नाम पुकारने वाला कोई मुख नहीं ,
                   दुःख ही दुःख हैं, इनके लिए रत्ती भर का सुख नहीं |

भाग्य के नाम पर मिलती है दुत्कार,
खाने के नाम पर फिका हुआ खाना और लोगों की फटकार |

                  नहीं हैं ढंग के कपडे ढकने को तन,
                  नए कपड़ों के स्थान पर करते हैं, उतरन से ही संतुष्ट मन |

धूप में लू के थपेड़ो को हैं ये सहते,
न जाने बरसात के दिनों में कैसे हैं ये रहते ! 

                 ठण्ड में ठिठुरने के अलावा कोई चारा नहीं,
                 इनसे ज्यादा कोई बेचारा नहीं |

घर के नाम पर बस है, "तीन गुणा तीन" का साया,
इसी में इनका पूरा परिवार नींद में समाया |

                 साथी हैं इनके जुआं और सट्टा,
                 देश के भविष्य को लग रहा है बट्टा |

Chocolates इन्हें भी भाती हैं,
मिठाई देख के इनकी भी जीभ ललचाती है |

                 बचपन तो इनका धरती पर आते ही जैसे खो गया,
                 स्नेह के अकाल में इनका बचपन पूरा गुजर गया |

सरकारें आती हैं, जाती हैं,
इनके लिए योजनायें बनाती ही रह जाती हैं |

                 सरकारों से उम्मीदें रखना है बेमानी,
                 बदलाव के लिए जरुरी है, जागृति फैलानी |

इनको भी बचपन जीने दो,
और भविष्य के सपने सीने दो |

                 मन में इनके भी लेती हैं, इच्छाएं आकार,
                 इनको भी करने दो सपने साकार |


               









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