कालरात्रि का संहार कर हुयी है, नयी भोर,
पक्षियों के कलरव का होने लगा मधुर शोर,
तान से तान मिलकर गाने लगे कोयल और मोर,
हर नयी तान में लगा के पहले से ज्यादा जोर |
अभी भी दिखती सुदूर नभ में है, चन्द्र-कोर,
उभरी आकृति क्षितिज पर जिसका ना है कोई छोर,
हर क्षण लगे मानो ऐसे, खींचे उसे कोई बिना डोर,
चढ़ती जाये वो आसमान में लगाये बिना कोई जोर |
स्वर्णिम उस आकृति से फैला उजाला चहुँ ओर,
दे रही भोर सन्देश मानो, शुरू हुआ एक नया दौर,
और कर रही है समाप्त अब ये सबकी निद्रा घोर,
शुरू हुयी सबकी दिनचर्या कर घड़ी के काँटों पर गौर |
निकले हैं चरवाहे के साथ चरने सभी ढोर,
और बछड़े रंभाते है लगा के अपना पूरा जोर,
स्त्रियाँ चलीं, ले गगरी, पनघट और कुएं की ओर,
बैठे है ताक लगा के वहां सब बेकाम चितचोर |
प्रकाश की उष्णता हो रही है हर क्षण तीव्र और,
मंद-ठंडी समीर भी अब पड़ रही है कमजोर,
खुले में विचरण करना अब हो रहा है कठोर,
बैठे वृक्षों की छाँव में पशु अपने शरीरों को बटोर |
हुयी अब समाप्त ये स्फूर्तिदायक भोर,
हो रहा हर्षित अब प्रतीक्षा में बैठा चकोर,
भोरांत से हुए हैं चिंतामुक्त, तारे और चन्द्र-कोर,
दिशा-पूर्व भी सोच रही, 'कब होगी अगली नयी भोर?' |
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