रविवार, 8 जुलाई 2012

बाँका



चला घर से दूर काम की खोज में एक और छरहरा बाँका,
बाँका जागा और उठके उसने खिड़की से झाँका,
"ये क्या! जाना था कोलकाता पहुँच गए हम  ढाका!",
जब वो शहर पहुँचा हो चुकी थी, तब तक राका |

मिला एक आदमी उसे, जो बताता था खुद को दूर की पहचान का काका,
सुन सारी बात, काम देकर उसे वो बन बैठे उसके आका,
नाता बताया था उन्होंने, 'हूँ मैं काका माला का',
ले जाके काका ने सिखाया बाँके को, कैसे बनाते है पटाखा |


एक दिन बाँका जा बैठा, फुर्सत में बजरिया के एक नाका,
कुछ आदमी आ धमके क्यूंकि ये था जग्गू का इलाका,
पड़ा सोच में था बाँका की कैसे करे वो सामना इस बला का,
दिखा के फुर्ती उसने नापा रास्ता वहां का।

काका को आकर उसने अपनी बहादुरी का किस्सा हाँका,
फलस्वरूप बेचारे बाँके ने रोज़ की तरह ही काका की झिड़की को फिर फाँका,
उदास बाँके को आया याद उसका गाँव, हुआ बड़ा वो पानी पीकर जहाँ का,
लौटने का सन्देश लिखने ले आया वो एक कागज और थामी एक शलाका।