मंगलवार, 2 अगस्त 2011

** वड़ा - पाव **

कहाँ गयी पेड़ों की वो छाँव हैं ?
अब तो बस चित्रों में रह गए, वो सुंदर गाँव हैं,
चारों ओर बस कौओं की काँव-काँव है |

कहाँ गया प्रेम का वो भाव है ?
आज अपनों के लिए ही समय का अभाव है !
ह्रदय पर लगते कई नित-नये घाव हैं |

फँसे भ्रष्टाचार की दलदल में सबके पाँव हैं,
जीवन का ही लगा आज दाँव है...
मनुष्य को फिर भी देखो कितना ताव है !

भंवर में फँसी ये मन की नाव है,
खाने में न रह गया चाव है,
रह गया खाने को बस वड़ा-पाव है... !!


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