शुक्रवार, 20 मार्च 2015

!!!! बूझो !!!!


प्रकाश बिन मेरा अस्तिव है कल्पना से परे, और है शून्य,
किन्तु तुम्हारे प्रकृति में विलय तक, आयु मेरी भी है अक्षुण्य |
प्रकाश है मेरा जन्मदाता, और तुम मेरे आधार,
घटते प्रकाश के साथ हो जाये जीवन मेरा जार-जार |

दिशा-दशा-आकार-विस्तार-घनत्व, स्वयं का मेरा कुछ नहीं होता,
कभी मेरा अस्तित्व तुम्हारे दायें, तो कभी बायें में है होता |
कभी तुम्हारे चलती पीछे, तो कभी हूँ चलती आगे,
चलती हूँ साथ निरंतर तब भी, जब तुम दौड़े-भागे |

कई भौगोलिक घटनायें हैं, मेरा ही प्रभाव,
मुझसे ही अस्तित्व में हैं आते, चन्द्रमा के सोलह भाव |
चन्द्र-सूर्य पर लगते हैं, मेरे कारण ही अस्थायी घाव,
मेरे सानिध्य में मिलती राहत, जब ग्रीष्म में चढ़ जाता सूरज का ताव |

वैसे तो मेरा रूप नहीं, और रंग है काला,
पर जब देखो तुम जल में खुद को लेती मैं, तुमसा रूप निराला |
जान गये होगे अब तक, मैं हूँ छाया,
रहूंगी साथ तुम्हारे तब तक, जब तक है तुम्हारे पास ये काया |

****************     परछाई      *******************

बुधवार, 18 मार्च 2015

शादी की भेल

एक माह अब होने को आया,
नए बंधन पर लिखने का हमें विचार आया,
जिस बंधन ने दिया जीवन को हमसाया,
और बड़ों के शुभाशीषों की छत्रछाया|

"आखिर हो ही गयी हमारी भी शादी,
कहती है जिसे आधी आबादी,
खुशहाली, और आधी, बर्बादी,
हो रहे अब हम भी जीवन के इस दौर के आदि|

औरों की तरह हम भी घूम आये सुदूर वादी,
बदले कुछ हम, छोड़ झोला और खादी,
बदले कुछ वो भी, बन चुलबुल कन्या से नारी सादी,
कदाचित सामंजस्य के गुण के कारण ही कहते हैं, इस बंधन को, अनादि|

पूछे लोगों से अनुभव इस दौर के,
बाँटे कुछ ने, बाकी खिसके दौड़ के,
जो कुछ भी अनुभव उन्होंने बाँटे,
हमने कुछ निम्नोक्त, उनमें से, कविता में पिरोने के लिए छाँटे|

'शादी एक खट्टा-मीठा एहसास है,
अपने जोड़ीदार को जानने का एक मंद-मंद प्रयास है,
नए नातों से सज्जित जीवन भर का उपहार और सत्कार है,
जगाती ह्रदय में गुदगुदी और अन्तःमन में संगीतात्मक झंकार है|'

कोई कहे, है ये सामंजस्य का, तो कोई भाग्य का खेल,
तो कोई, मेल है ये दो व्यक्तित्वों का चाहे आचार-विचार हो उनके बेमेल,
कोई कहे, है ये बंधन पवित्र, तो कोई कहे है ये बिन जमानत की जेल,
तो कोई, ये है अनूठे भावों, घटनाओं, उतार-चढ़ावों से बनी चटपटी खट्टी-मीठी भेल|' "