बुधवार, 23 फ़रवरी 2011

क्यूँ ???

                                                

क्यूँ आज पैसा कमाने की दौड़ में खुशियों की परिभाषा ही बदल गयी,
आँखों की निश्चलता इस  चका-चौंध में जैसे कहीं गुम ही गयी?

क्यूँ आज सहनशीलता मानो मरुस्थल में मरूद्यान सी हो चली,
अराजकता ही मानव की जीवन संगिनी है हो चली?

क्यूँ आज सामंजस्य, समझौता, सर्व-सम्मति जैसे शब्द मानव को नव-निराले लगते हैं,
और नव-निरंतर निर्मित अपशब्द ही निज और प्यारे से लगते हैं?

क्यूँ कभी दैदीप्यमान रहे प्रेम, स्नेह आज मलिन से लगते हैं,
स्वार्थ और वासना ही मानव के शिरोधार्य रहते हैं?

क्यूँ आज सहयोग और सहकार्य तो जैसे किसी धूमिल स्मृति से लगते हैं,
प्रतिस्पर्धा के नाम पर मानव के मन में बस इर्ष्या और द्वेष ही बसते हैं?

क्यूँ आज मानव हो रहा है दंभी और स्वार्थी,
मानवता की तो जैसे मानव के ही हाथों उठती है अर्थी?

क्यूँ आज रिश्ते-नाते पीठ पर लादे हुए बोझ के समान लगते हैं,
अतिथि तो अब घर के बजट को नगवारे ही लगते हैं?

क्यूँ आज रोशनी है पर दिवाली नहीं,
लगता है मानव को प्रकृति माँ प्यारी नहीं?

क्यूँ विकासांध मानव को नहीं है किसी के जीवन का कुछ  मूल्य,
तो इसमे अचम्भा ही क्या है, जो कर रहा है नष्ट धरा की सम्पदा अमूल्य?

फिर भी मन में एक आस है,
जल्द ही बुझेगी मानव की ये प्यास है.

हे इश्वर मानव के मस्तिष्क को झकझोर दे,
मानव के इस अवचेतन मन में सुप्त सदगुणों  को एक नया जीवन दे!

मानव न कर इस सृष्टि को नष्ट तू,
कम से कम अब तो हो जा संतुष्ट तू!

हे मानव तू जागृत क्यूँ नहीं होता,
आखिर क्यूँ नहीं ये जीवन अपना सार्थक कर देता?

मंगलवार, 22 फ़रवरी 2011

गणतंत्र

                                                                    

हैं भाग्यशाली हम, जन्में जो हम इस पुण्यभूमि पर,
जिसका कण-कण है पुण्य तीर्थ के समान;
जिसकी सभ्यता है धनी और जिसमें  हैं सम्पदा अपार,
विविधता में एकता है जिसकी शान.

कर गए सेनानी अपना जीवन इस पर निसार,
ना किया उन्होंने स्वहित का विचार;
उन्हीं के इस बलिदान से आज हम स्वतंत्र हैं,
उनकी दूरदृष्टि से ही आज भारत गणतंत्र है.

पर आज के जनप्रतिनिधियों ने देश को कहीं का न छोड़ा,
इन्होने तो देश की ही सम्पदा को है रह-रह कर निचोड़ा;
देश की अर्थव्वस्था की दशा से सब परिचित हैं,
ये भी नेता न कहलाने लायक नेताओं की ही करतूत हैं.

आज नागरिको में इच्छा-शक्ति की कमी सी जान पड़ती है,
किसी बड़े बदलाव को दिशा देने की चपलता तो दूर , ५ किमी  दूरी पर अपना मत देने में भी  जान पे आ बनती है;
सब तरफ अराजकता का ही राज है,
लगता अवसाद ग्रसित हमारा ये समाज है.

ये देख के लगता है २०५० तक भारत को सर्व-शक्तिमान बनाने का स्वप्न, स्वप्न ही न रह जाए,
भारत कहीं दुर्गति के रसातल में न गिर जाये!
ऐसे किसी दुष्परिणाम से बचने के लिए जन-जन का योगदान है ज़रूरी,
तभी होगी हमारे सेनानियों की अपूर्ण इच्छा पूरी.

आज करें दृढ़-संकल्प हम, बना देंगे भारत को सिरमौर हम,
केवल अधिकरों की माँग न करके कर्तव्यों का भी निर्वहन करेंगे हम;
स्वहित से बढ़कर देशहित को देंगे प्राथमिकता हम,
इस सुसंकल्प को चरितार्थ कर, भारत को फिर विश्वगुरु बनायेंगे हम,
भारत को एक आदर्श जनतंत्र बनाकर अपना भी जीवन सफल बनाएं हम.

जय हिंद!!