क्यूँ आज पैसा कमाने की दौड़ में खुशियों की परिभाषा ही बदल गयी,
आँखों की निश्चलता इस चका-चौंध में जैसे कहीं गुम ही गयी?
क्यूँ आज सहनशीलता मानो मरुस्थल में मरूद्यान सी हो चली,
अराजकता ही मानव की जीवन संगिनी है हो चली?
क्यूँ आज सामंजस्य, समझौता, सर्व-सम्मति जैसे शब्द मानव को नव-निराले लगते हैं,
और नव-निरंतर निर्मित अपशब्द ही निज और प्यारे से लगते हैं?
क्यूँ कभी दैदीप्यमान रहे प्रेम, स्नेह आज मलिन से लगते हैं,
स्वार्थ और वासना ही मानव के शिरोधार्य रहते हैं?
क्यूँ आज सहयोग और सहकार्य तो जैसे किसी धूमिल स्मृति से लगते हैं,
प्रतिस्पर्धा के नाम पर मानव के मन में बस इर्ष्या और द्वेष ही बसते हैं?
क्यूँ आज मानव हो रहा है दंभी और स्वार्थी,
मानवता की तो जैसे मानव के ही हाथों उठती है अर्थी?
क्यूँ आज रिश्ते-नाते पीठ पर लादे हुए बोझ के समान लगते हैं,
अतिथि तो अब घर के बजट को नगवारे ही लगते हैं?
क्यूँ आज रोशनी है पर दिवाली नहीं,
क्यूँ आज रोशनी है पर दिवाली नहीं,
लगता है मानव को प्रकृति माँ प्यारी नहीं?
क्यूँ विकासांध मानव को नहीं है किसी के जीवन का कुछ मूल्य,
तो इसमे अचम्भा ही क्या है, जो कर रहा है नष्ट धरा की सम्पदा अमूल्य?
तो इसमे अचम्भा ही क्या है, जो कर रहा है नष्ट धरा की सम्पदा अमूल्य?
फिर भी मन में एक आस है,
जल्द ही बुझेगी मानव की ये प्यास है.
हे इश्वर मानव के मस्तिष्क को झकझोर दे,
मानव के इस अवचेतन मन में सुप्त सदगुणों को एक नया जीवन दे!
मानव न कर इस सृष्टि को नष्ट तू,
कम से कम अब तो हो जा संतुष्ट तू!
हे मानव तू जागृत क्यूँ नहीं होता,
आखिर क्यूँ नहीं ये जीवन अपना सार्थक कर देता?
कम से कम अब तो हो जा संतुष्ट तू!
हे मानव तू जागृत क्यूँ नहीं होता,
आखिर क्यूँ नहीं ये जीवन अपना सार्थक कर देता?