शनिवार, 22 अप्रैल 2017



जीवन क्या है?

अनन्त संघर्ष यात्रा या सुख चूरन की मात्रा ?
प्रश्नोत्तर विशाल, या 'आस और नैराश्य' का महीन जाल ?

आसक्ति है या वैराग्य, कर्म है या भाग्य !
भूत है या वर्तमान, सतत है या स्थिर !
इच्छा है या संतुष्टि, बंधन है या मुक्ति !
हताशा है या उत्साह, लाचारी है या कर्म-उत्कंठा !
अभीष्ट है, समाधान है या शंका !
शुष्क है या तर, संगठित है या है तितर-बितर!

कभी विनती है, तो कभी निर्देश,कभी समक्ष है तो कभी दृष्टान्त;
कभी आक्रांत - विक्रांत, तो कभी असीम शांत जैसे शेष शैया पर निद्रित लक्ष्मीकान्त ।
कभी चिंतन है, कभी निंदा कभी दर्शन,
कभी अवसाद, कभी हर्ष कभी अनावश्यक प्रदर्शन ।
कभी विस्तृत कभी संकीर्ण, कभी तेजपूर्ण कभी जीर्ण,
कभी तीव्र कभी क्षीण, कभी सपन्न कभी दीन ।
उत्साह की छटा, आनंद की घटा, कभी प्रगति की लता ।
अपार जिरह है, कभी सहमति-विरोध है ।
समर्पण है, मान है कभी, तो कभी अर्पण,
कभी पारभासी, कभी दर्पण ।

है जीवन भानुमति का पिटारा,
कभी पतन का रसातल, तो कभी उत्कर्ष का ध्रुव तारा ।
विवेचना बहुत अब कर ली,
फिर भी मन में जिज्ञासा और ही है भàर ली,
जैसे हर दिन हो कक्षा पहली
फिर भी जीवन है एक अबूझ पहेली।



बुधवार, 27 अप्रैल 2016

महीना अप्रैल का



अप्रैल के इस महीने में, बागों में हैं फूल खिले,
बहुत दिनों बाद आज, सभी परिवार-जन हैं मिले।

इस मौसम में खिलने वाले गुलमोहर के फूल, ध्यान खींच ही लेते हैं,
सूरज जी भी अपने पारे में इज़ाफा करने लगते हैं।

महिना, अप्रैल का, लेकर आता पसेरी भर ख़ुशी,
चूँकि लाता हैं छुट्टियाँ और छुट्टियों में यात्रायें बिखेरती हैं मुख पर हँसी।

अप्रैल के ही एक सफर में रची थी हमने, अपनी पहली कविता,
जब बैठे थे हम बस में और सर पर चढ़ा था सविता।

गर्मियों की छुट्टियाँ, कभी-कभी लगती थीं जेल,
ऐसे में जाना हो, कहीं घर के बाहर, तो मिल जाती थी bail।

छुट्टियों में, रिश्तेदारों के घर, की ओर हमारे कदम बढ़ चलते थे,
चाचा, मामा, मौसी और बुआ, ये उस सूची में अव्वल रहते थे।

शुरू होता था फिर बातों का दौर, कभी ताश तो कभी सैर,
झड़प भी आम थी, पर नहीं होता था किसी का किसी से बैर।

छुट्टियों में उपरोक्त बातें आम थीं, आम बनते थे इन छुट्टियों को और खास, 
फरमाइशें होती थी पकवानों की, और रहती थी फिर उनके बनने की आस।

छुट्टियों में कभी-कभी छोड़ आते थे, दे दूर हम अपना प्रदेश,
वापस लौटते समय मिलते थे, कभी-कभी नए वेश।

छुट्टियों में किये उन मजो की यादें हैं, बहुत और कमाल की,
बहुप्रतीक्षित है फिर वह 'अप्रैल', जो तरोताज़ा कर जाये यादें उस धमाल की।  








शुक्रवार, 20 मार्च 2015

!!!! बूझो !!!!


प्रकाश बिन मेरा अस्तिव है कल्पना से परे, और है शून्य,
किन्तु तुम्हारे प्रकृति में विलय तक, आयु मेरी भी है अक्षुण्य |
प्रकाश है मेरा जन्मदाता, और तुम मेरे आधार,
घटते प्रकाश के साथ हो जाये जीवन मेरा जार-जार |

दिशा-दशा-आकार-विस्तार-घनत्व, स्वयं का मेरा कुछ नहीं होता,
कभी मेरा अस्तित्व तुम्हारे दायें, तो कभी बायें में है होता |
कभी तुम्हारे चलती पीछे, तो कभी हूँ चलती आगे,
चलती हूँ साथ निरंतर तब भी, जब तुम दौड़े-भागे |

कई भौगोलिक घटनायें हैं, मेरा ही प्रभाव,
मुझसे ही अस्तित्व में हैं आते, चन्द्रमा के सोलह भाव |
चन्द्र-सूर्य पर लगते हैं, मेरे कारण ही अस्थायी घाव,
मेरे सानिध्य में मिलती राहत, जब ग्रीष्म में चढ़ जाता सूरज का ताव |

वैसे तो मेरा रूप नहीं, और रंग है काला,
पर जब देखो तुम जल में खुद को लेती मैं, तुमसा रूप निराला |
जान गये होगे अब तक, मैं हूँ छाया,
रहूंगी साथ तुम्हारे तब तक, जब तक है तुम्हारे पास ये काया |

****************     परछाई      *******************

बुधवार, 18 मार्च 2015

शादी की भेल

एक माह अब होने को आया,
नए बंधन पर लिखने का हमें विचार आया,
जिस बंधन ने दिया जीवन को हमसाया,
और बड़ों के शुभाशीषों की छत्रछाया|

"आखिर हो ही गयी हमारी भी शादी,
कहती है जिसे आधी आबादी,
खुशहाली, और आधी, बर्बादी,
हो रहे अब हम भी जीवन के इस दौर के आदि|

औरों की तरह हम भी घूम आये सुदूर वादी,
बदले कुछ हम, छोड़ झोला और खादी,
बदले कुछ वो भी, बन चुलबुल कन्या से नारी सादी,
कदाचित सामंजस्य के गुण के कारण ही कहते हैं, इस बंधन को, अनादि|

पूछे लोगों से अनुभव इस दौर के,
बाँटे कुछ ने, बाकी खिसके दौड़ के,
जो कुछ भी अनुभव उन्होंने बाँटे,
हमने कुछ निम्नोक्त, उनमें से, कविता में पिरोने के लिए छाँटे|

'शादी एक खट्टा-मीठा एहसास है,
अपने जोड़ीदार को जानने का एक मंद-मंद प्रयास है,
नए नातों से सज्जित जीवन भर का उपहार और सत्कार है,
जगाती ह्रदय में गुदगुदी और अन्तःमन में संगीतात्मक झंकार है|'

कोई कहे, है ये सामंजस्य का, तो कोई भाग्य का खेल,
तो कोई, मेल है ये दो व्यक्तित्वों का चाहे आचार-विचार हो उनके बेमेल,
कोई कहे, है ये बंधन पवित्र, तो कोई कहे है ये बिन जमानत की जेल,
तो कोई, ये है अनूठे भावों, घटनाओं, उतार-चढ़ावों से बनी चटपटी खट्टी-मीठी भेल|' "

रविवार, 8 जुलाई 2012

बाँका



चला घर से दूर काम की खोज में एक और छरहरा बाँका,
बाँका जागा और उठके उसने खिड़की से झाँका,
"ये क्या! जाना था कोलकाता पहुँच गए हम  ढाका!",
जब वो शहर पहुँचा हो चुकी थी, तब तक राका |

मिला एक आदमी उसे, जो बताता था खुद को दूर की पहचान का काका,
सुन सारी बात, काम देकर उसे वो बन बैठे उसके आका,
नाता बताया था उन्होंने, 'हूँ मैं काका माला का',
ले जाके काका ने सिखाया बाँके को, कैसे बनाते है पटाखा |


एक दिन बाँका जा बैठा, फुर्सत में बजरिया के एक नाका,
कुछ आदमी आ धमके क्यूंकि ये था जग्गू का इलाका,
पड़ा सोच में था बाँका की कैसे करे वो सामना इस बला का,
दिखा के फुर्ती उसने नापा रास्ता वहां का।

काका को आकर उसने अपनी बहादुरी का किस्सा हाँका,
फलस्वरूप बेचारे बाँके ने रोज़ की तरह ही काका की झिड़की को फिर फाँका,
उदास बाँके को आया याद उसका गाँव, हुआ बड़ा वो पानी पीकर जहाँ का,
लौटने का सन्देश लिखने ले आया वो एक कागज और थामी एक शलाका।

बुधवार, 2 नवंबर 2011

भोर



कालरात्रि का संहार कर हुयी है, नयी भोर,
पक्षियों के कलरव का होने लगा मधुर शोर,
तान से तान मिलकर गाने लगे कोयल और मोर,
हर नयी तान में लगा के पहले से ज्यादा जोर |

अभी भी दिखती सुदूर नभ में है, चन्द्र-कोर,
उभरी आकृति क्षितिज पर जिसका ना है कोई छोर,
हर क्षण लगे मानो ऐसे, खींचे उसे कोई बिना डोर,
चढ़ती जाये वो आसमान में लगाये बिना कोई जोर |

स्वर्णिम उस आकृति से फैला उजाला चहुँ ओर,
दे रही भोर सन्देश मानो, शुरू हुआ एक नया दौर,
और कर रही है समाप्त अब ये सबकी निद्रा घोर,
शुरू हुयी सबकी दिनचर्या कर घड़ी के काँटों पर गौर |

निकले हैं चरवाहे के साथ चरने सभी ढोर,
और बछड़े रंभाते है लगा के अपना पूरा जोर,
स्त्रियाँ चलीं, ले गगरी, पनघट और कुएं की ओर,
बैठे है ताक लगा के वहां सब बेकाम चितचोर |

प्रकाश की उष्णता हो रही है हर क्षण तीव्र और, 
मंद-ठंडी समीर भी अब पड़ रही है कमजोर, 
खुले में विचरण करना अब हो रहा है कठोर,
बैठे वृक्षों की छाँव में पशु अपने शरीरों को बटोर |

हुयी अब समाप्त ये स्फूर्तिदायक भोर,
हो रहा हर्षित अब प्रतीक्षा में बैठा चकोर,
भोरांत से हुए हैं चिंतामुक्त, तारे और चन्द्र-कोर,
दिशा-पूर्व भी सोच रही, 'कब होगी अगली नयी भोर?' |

रविवार, 16 अक्टूबर 2011

द्वय - आँखें

दुःख में नीर बहाती आँखें,
सुख में भी भर आती आँखें |
प्रियजनों को देख हर्षाती आँखें,
अनचाहों को देख रक्तित हो जाती आँखें |


                                                    स्वप्नों से बहराई आँखे,
                                                    चिंता में गहराई आँखे |
                                                    प्रतीक्षा में पथराई आँखें,
                                                    अश्रुओं से तर आई आँखें |

जग का दर्शन कराती आँखें,
सबका सच बताती आँखें |
रंगों की पहचान कराती आँखें,
अवरोधों से बचाती आँखें |

                                                    मुख की शोभा बढ़ाती आँखें,
                                                    लहरों से लहराती आँखें |
                                                    लज्जा से झुक जाती आँखे,
                                                    संकेतों में संदेशे बताती आँखें |


चुप रह कर भी बहुत कुछ कह जाती ये आँखे,
और बहुत कुछ कहकर भी कुछ न कह पाती ये आँखें |
अभिनय और नृत्य का विशेष अंग हैं ये आँखें,
कोई भी भाव अधूरा है, जब तक प्राण न भरें उसमें ये आँखें |


                                                    बड़ी अनमोल हैं द्वय ये आँखें,
                                                    न करे व्यर्थ, करें दान ये अतुल्य आँखें |
                                                    कर दें दीप्त और भी जीवन देकर ये आँखें,
                                                    और कर दें अमर अपनी ये अद्भुत द्वय आँखें |