कितने काले मेघ हैं छाये, लेकर घनघोर वर्षा हैं आये,
ढेर सारा हर्ष और किसी-किसी के लिए वेदना भी लाये |
करें निवेदन इनसे आयें, तप्त इस धरती की तृष्णा पूर्ण बुझा के ही जाएँ,
पर बरसे बस उतना ही, जितना इस धरा में समा पाए|
सूरज और मेघों की आँख-मिचौली गयी, अंततः थम,
धरती आज हुयी है, बड़े दिनों बाद नम|
शुरू हो गयी है, बरखा की जोरों की झड़ी,
गुम हो गयी इस झड़ी में, वो धूप कड़ी|
बच्चे तो आज सड़क पर ही हैं नहाते,
'और जोर से बरसो' बस यही पुरजोर हैं चिल्लाते |
बड़े तो किसी टपरे के नीचे चाय-पकौड़े हैं उड़ाते,
युगल भीगते हुए ही, भुट्टे का लुत्फ़ हैं उठाते |
तो वृद्धजन बरामदे से ही दृश्य हैं निहारते,
राहगीर घने पेड़ों के नीचे अपना सिर हैं छुपाते |
कौंधती ये बिजली कर देती है, सभी के रोंगटे खड़े,
गर्जना की ध्वनि से विचलित होते हैं सभी, बच्चे-बूढ़े और या हों बड़े|
चहुँ ओर जल-धारायें हैं दिखती,
ठंडी समीर तन-मन को ताज़ा है कर देती |
वर्षा का वेग कुछ कम हुआ सा है जान पड़ता,
परन्तु बरखा रानी का मन तो और बरसने का है लगता |
मेघ अब भी रिमझिम-रिमझिम हैं बरसते,
पाठशाला के कमरों के छत तो अब भी रह-रह कर हैं टपकते |
मेंढक ऊँची कूद की प्रोतियोगिता हैं करते ,
और मयूर नृत्य-स्पर्धा करते से हैं लगते|
पक्षियों के ये कलरव कर्णप्रिय हैं लगते,
चहुँ ओर नव-निराले संगीत सुनने को वर्षाकाल में है मिलते|
वर्षा-वेग कम होते ही जनजीवन सामान्य है हो चला,
हर राहगीर फिर अपनी मंजिल की ओर बढ़ चला |
वर्षा को आज है विराम,
मानो मेघराज कर रहे हैं आज विश्राम|
बादलों की चादर से निकले सूर्य नारायण, हुयी इनकी निद्रा है भंग,
फिर भी झिलमिला दी इन्होने धरती, मिल के बूंदों के संग |
नव-जीवन के अंकुर धरती से हैं फूटे,
दिखते है सभी दिशाओं में नये फूल-पत्ते और बूटे|
आशा है वर्षा का ये आगमन, आ-गमन न हो जाए,
इस बार ये वर्षा केवल हर्ष ही हर्ष और नगण्य वेदना देके जाएँ|