मंगलवार, 22 फ़रवरी 2011

गणतंत्र

                                                                    

हैं भाग्यशाली हम, जन्में जो हम इस पुण्यभूमि पर,
जिसका कण-कण है पुण्य तीर्थ के समान;
जिसकी सभ्यता है धनी और जिसमें  हैं सम्पदा अपार,
विविधता में एकता है जिसकी शान.

कर गए सेनानी अपना जीवन इस पर निसार,
ना किया उन्होंने स्वहित का विचार;
उन्हीं के इस बलिदान से आज हम स्वतंत्र हैं,
उनकी दूरदृष्टि से ही आज भारत गणतंत्र है.

पर आज के जनप्रतिनिधियों ने देश को कहीं का न छोड़ा,
इन्होने तो देश की ही सम्पदा को है रह-रह कर निचोड़ा;
देश की अर्थव्वस्था की दशा से सब परिचित हैं,
ये भी नेता न कहलाने लायक नेताओं की ही करतूत हैं.

आज नागरिको में इच्छा-शक्ति की कमी सी जान पड़ती है,
किसी बड़े बदलाव को दिशा देने की चपलता तो दूर , ५ किमी  दूरी पर अपना मत देने में भी  जान पे आ बनती है;
सब तरफ अराजकता का ही राज है,
लगता अवसाद ग्रसित हमारा ये समाज है.

ये देख के लगता है २०५० तक भारत को सर्व-शक्तिमान बनाने का स्वप्न, स्वप्न ही न रह जाए,
भारत कहीं दुर्गति के रसातल में न गिर जाये!
ऐसे किसी दुष्परिणाम से बचने के लिए जन-जन का योगदान है ज़रूरी,
तभी होगी हमारे सेनानियों की अपूर्ण इच्छा पूरी.

आज करें दृढ़-संकल्प हम, बना देंगे भारत को सिरमौर हम,
केवल अधिकरों की माँग न करके कर्तव्यों का भी निर्वहन करेंगे हम;
स्वहित से बढ़कर देशहित को देंगे प्राथमिकता हम,
इस सुसंकल्प को चरितार्थ कर, भारत को फिर विश्वगुरु बनायेंगे हम,
भारत को एक आदर्श जनतंत्र बनाकर अपना भी जीवन सफल बनाएं हम.

जय हिंद!!

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