बुधवार, 27 अप्रैल 2016

महीना अप्रैल का



अप्रैल के इस महीने में, बागों में हैं फूल खिले,
बहुत दिनों बाद आज, सभी परिवार-जन हैं मिले।

इस मौसम में खिलने वाले गुलमोहर के फूल, ध्यान खींच ही लेते हैं,
सूरज जी भी अपने पारे में इज़ाफा करने लगते हैं।

महिना, अप्रैल का, लेकर आता पसेरी भर ख़ुशी,
चूँकि लाता हैं छुट्टियाँ और छुट्टियों में यात्रायें बिखेरती हैं मुख पर हँसी।

अप्रैल के ही एक सफर में रची थी हमने, अपनी पहली कविता,
जब बैठे थे हम बस में और सर पर चढ़ा था सविता।

गर्मियों की छुट्टियाँ, कभी-कभी लगती थीं जेल,
ऐसे में जाना हो, कहीं घर के बाहर, तो मिल जाती थी bail।

छुट्टियों में, रिश्तेदारों के घर, की ओर हमारे कदम बढ़ चलते थे,
चाचा, मामा, मौसी और बुआ, ये उस सूची में अव्वल रहते थे।

शुरू होता था फिर बातों का दौर, कभी ताश तो कभी सैर,
झड़प भी आम थी, पर नहीं होता था किसी का किसी से बैर।

छुट्टियों में उपरोक्त बातें आम थीं, आम बनते थे इन छुट्टियों को और खास, 
फरमाइशें होती थी पकवानों की, और रहती थी फिर उनके बनने की आस।

छुट्टियों में कभी-कभी छोड़ आते थे, दे दूर हम अपना प्रदेश,
वापस लौटते समय मिलते थे, कभी-कभी नए वेश।

छुट्टियों में किये उन मजो की यादें हैं, बहुत और कमाल की,
बहुप्रतीक्षित है फिर वह 'अप्रैल', जो तरोताज़ा कर जाये यादें उस धमाल की।  








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